कबीर के दोहे अर्थ सहित | Kabir Ke Dohe with Meaning in Hindi
कबीर के प्रसिद्ध दोहे हिंदी अर्थ सहित पढ़ें। जीवन बदल देने वाले Kabir Ke Dohe with Meaning in Hindi जो आपको ज्ञान और प्रेरणा देंगे।
कबीर दास जी हिंदी साहित्य के महान संत और कवि थे, जिन्होंने अपने दोहों के माध्यम से जीवन की सच्चाई, धर्म, कर्म और मानवता का संदेश दिया। उनके दोहे सरल भाषा में होते हैं, लेकिन उनमें गहरा अर्थ छिपा होता है। आज भी कबीर के दोहे हमें सही रास्ता दिखाते हैं और जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा देते हैं। इस लेख में हम कबीर के प्रसिद्ध दोहे उनके हिंदी अर्थ सहित जानेंगे।
Kabir Ke Dohe with Meaning in Hindi
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| Kabir ke dohe with meaning in Hindi |
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताए|| गुरु और गोविन्द दोनों खड़े हैं, समझ नहीं आता पहले किसको नमस्कार किया जाय! पहले गुरु को ही नमस्कार करना उचित होगा क्योंकि गुरु ने ही गोविंद के बारे में बताया है !
आपा मेटैं हरि भजैं, तब पावैं दीदार||गुरु और ईश्वर में कोई अन्तर नहीं है, दोनों एक ही हैं। बाहर से दोनों में भले ही अन्तर है, पर अन्दर से दोनों एक ही हैं। मन से " मैं " की भावना को निकालकर हरि को भजने से मन का सारा मैल निकल जाता है, और तब हरि का दर्शन हो जाता है।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष||गुरु के बीना ज्ञान नहीं मिलता और गुरु के बीना मोक्ष भी नहीं मिलता! गुरु के बिना सत्य की पहचान नहीं होती और गुरु के बिना मन का भ्रम भी दूर नहीं होता !
तीन लोक की संपदा, सो गुरु दीन्ही दान||गुरु के समान इस संसार में कोई देने वाला नहीं है और शिष्य के समान कोई मांगने वाला भी नहीं है! गुरु तो ऐसे होते है कि तीनों लोकों का ज्ञान शिष्य को एक इशारे में दे देते हैं!
बहुतक भोंदू बह गये, राखि जीव अभिमान||गुरु से ज्ञान लेते समय अपना सर उनके चरणों में झुका दीजिए! गुरु के सामने अकड़ दिखाने वाले बहुत से अज्ञानी इस दुनिया से बह गए अर्थात् कभी कल्याण न प्राप्त कर सके!
वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत||सभी ज्ञानी लोग, गुरु और पारस पत्थर के अन्तर को भलीभांति समझते हैं! पारस पत्थर लोहे को सोना करता है और गुरु अपने शिष्य को ज्ञान का बोध कराकर उसे महान बना देता है !
सुख सम्पत्ति को कह चली, नहीं नरक में ठौर||गुरु का साथ छोड़कर जो व्यक्ति दूसरों पर विश्वाश करता है, उसको सुख सम्पत्ति तो मिलती नहीं ऊपर से नरक के द्वार भी उसके लिए बंद हो जाते हैं!
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट||गुरु कुम्हार के समान और शिष्य कच्चे घड़े के समान है, जैसे कुम्हार घड़े को मज़बूत और टिकाऊ बनाने के लिए अंदर से हाथ लगा कर बाहर से थपथपाता है, ठीक उसी प्रकार गुरु भी शिष्य को ठोक-पीटकर संसार में एक आदरणीय व्यक्ति बना देता है! "गुरु की प्रताड़ना स्वाभाविक और शिष्य के हित में है!"
कहैं कबीर ता दास को, तीन लोक भय नाहिं||गुरु को सिर का ताज समझकर उनकी आज्ञा को जो कोई नर मानते हैं, तीनों लोकों में वे सभी प्रकार का भय से मुक्त हो जाते हैं!
कहै कबीर गुरु रूठते, हरि नहिं होत सहाय||कबीर जी कहते हैं कि यदि हरि आपसे रूठ जाते हैं तो गुरु की शरण में जाने से बात बन जाती है, किन्तु यदि आपसे गुरु रूठ जाते हैं तो हरि के पास जाने से भी लाभ नहीं होता है! अतः गुरु को प्रसन्न रखना सर्वदा उचित है!
हरि के रूठे ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर||वे लोग अंधे हैं, जो गुरु को कोई महत्व नहीं देते क्योंकि हरि के नाराज हो जाने पर गुरु के चरणों में स्थान मिल जाता है किंतु गुरु के नाराज हो जाने पर हरि के चरणों में भी स्थान नहीं मिलता।
प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरण भाग मिलाय||कबीर जी कहते हैं कि भगवान की भक्त अभी प्राप्त होती है, जब गुरु कृपा होती है! बिना गुरु की अनुकंपा के भगवान की भक्ति को प्राप्त करना असंभव कार्य है!
सुमति गयी अति लोभते, भक्ति गयी अभिमान||कबीरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार सूर्य के दिखते ही अंधकार गायब हो जाता है और दुर्बुद्धि गुरु का ज्ञान पाकर दूर हो जाती है, ठीक उसी तरह अधिक लोभ के होने से सद्बुद्धि समाप्त हो जाती है और अत्यधिक अहंकार के होने से भक्ति चली जाती है!

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